पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

(From Mankati  to Mahaadhriti )

Radha Gupta, Suman Agarwal & Vipin Kumar

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Makara - Mangala ( Makara, Makha, Magadha, Magha, Mankana, Mankanaka, Manki, Mangala.)

Mangalachandi - Manikarnikaa  ( Mangalaa, Mani / gem, Manikarnikaa etc.)

Manikundala - Manduuka ( Manibhadra, Mandapa, Mandala, Manduuka / frog etc.)

Matanga - Matsyendranaatha  ( Matanga, Mati / intellect / intention, Matsya / fish etc.)

Matsyodari - Madanasundari ( Mathana, Mathuraa, Mada, Madana etc.)

Madanasundari - Madhu ( Madayanti, Madaalasaa, Madiraa / wine, Madra, Madhu / honey etc.)

Madhu - Madhya ( Madhu, Madhu-Kaitabha, Madhuchchhandaa, Madhusudana, Madhya / middle etc.)

Madhyandina - Manasvini (Madhyama / middle, Mana / mind, Manasaa etc.)

Manu - Manonuga ( Manu, Manojava etc. )

Manobhadra - Manahswaami ( Manoratha / wish, Manoramaa etc.)

Mantra - Manda ( Mantra, Manthana / stirring,  Mantharaa, Manda / slow etc.)

Mandagaa - Mandodari ( Mandara, Mandaakini, Mandira / temple, Mandehaa, Mandodari etc.)

Mandodari - Maya (Manthana / stirring, Manmatha, Manvantara, Mamataa, Maya etc. )

Mayuukha - Maru (  Mayuura / peacock, Mareechi, Maru etc. )

Maruta - Marudvati ( Maruta, Marutta etc.)

Marudvridhaa - Malla ( Marka, Markata / monkey, Maryaadaa / limit, Mala / waste, Malaya, Malla / wrestler etc. )

Mallaara - Mahaakarna ( Maha, Mahat, Mahaa etc. )

Mahaakaala - Mahaadhriti ( Mahaakaala, Mahaakaali, Mahaadeva etc. )

 

 

 

 

 

 

मकर

टिप्पणी – पुराणों में मकर के महत्त्व से हम परिचित ही हैं। जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, तब उत्तरायण का आरम्भ होता है। गंगा का वाहन मकर है। कामदेव को मकरध्वज कहा जाता है इत्यादि। ऐसा प्रतीत होता है कि पुराणों में मकार को परोक्ष रूप से मकर नाम दे दिया गया है। अतः मकर को समझने के लिए मकार को समझने की आवश्यकता है। प्राणायाम की व्याख्या ओंकार के तीन अक्षरों के आधार पर की जाती है – अ, उ तथा म। अ अक्षर वायु के पूरण का प्रतीक है। उ अक्षर वायु के धारण का, कुम्भक का प्रतीक है। म अक्षर वायु के विसर्जन या रेचक का प्रतीक है। इस तथ्य को बृहत्तर रूप में इस प्रकार कहा जा सकता है कि अ द्वारा धनात्मक ऊर्जा का, प्राणों का ब्रह्माण्ड से पूरण करना है। ब्रह्माण्ड में तो बहुत प्रकार के प्राण हैं। लेकिन कोई ऐसी विधि निकालनी है कि केवल धनात्मक प्राणों का ही अवशोषण हो। आधुनिक भौतिक विज्ञान के अनुसार इसे इस प्रकार कहा जा सकता है कि हम जिन प्राणों का ग्रहण करें, चाहे वायु के रूप में, चाहे भोजन के रूप में, वह हमारे अन्दर धनात्मकता उत्पन्न करें, ऋणात्मकता उत्पन्न न करें। फिर उकार कोई ऐसा तन्त्र है जिसके द्वारा अवशोषित धनात्मक प्राणों को अपने अन्दर स्थिर करना है, उकार का कार्य योनि जैसा होगा जिसमें धनात्मक प्राण वर्धन कर सकेंगे। फिर जिन प्राणों का वर्धन नहीं हो सका, उनको बाहर फेंकना है। यह कार्य मकार के द्वारा करने का निर्देश है। यदि बाहर फेंकने के लिए कुछ शेष नहीं बचा है, तो अपने संचित प्राणों को बाहर भेजा जा सकता है। कहा गया है कि हमारी इन्द्रियों को जो शक्ति मिलती है, वह दो प्रकार की है – ऊष्माण व अन्तस्थ। ऊष्माणमिन्द्रियाण्याहुः अन्तस्था बलमात्मनः।। - भागवत पुराण। वर्णमाला में म के बाद जिन वर्णों के स्थान दिया गया है, वह हैं – य, र, ल, व, श, ष, स, ह। इनमें य, र, ल, व अन्तस्थ प्रकार के हैं, अर्थात् उनको बोलने में ऊष्णा का अवशोषण होता है। श, ष, स वर्ण ऊष्माण प्रकार के हैं जिनको बोलने में ऊष्मा का जनन होता है। यह कहा जा सकता है कि सामान्य रूप से हमारी इन्द्रियों को जो शक्ति मिल रही है, वह हमारी चेतना द्वारा म यन्त्र के माध्यम से बाहर फेंके गए व्यर्थ प्राण हैं, जिनका चेतना उपयोग नहीं कर पाई है। ऐसा सम्भव है कि चेतना की वह स्थिति आ जाए जब बाहर फेंकने को कुछ भी शेष न रहे। तब वह अपनी संचित ऊर्जा बाहर फेंक सकती है। यह ऊर्जा अन्तस्थ प्रकार की होगी। अन्तस्थ व ऊष्माण ऊर्जाओं में अंतर यह होगा कि ऊष्माण प्राण से सक्रिय इन्द्रियों को अन्तर्मुखी नहीं किया जा सकता, अन्तस्थ ऊर्जा से सक्रिय इन्द्रियों को अन्तर्मुखी किया जा सकता है। इसी कारण कहा गया है कि जब सूर्य मकर राशि में आता है, तब उत्तरायण का, देवयान का, धनात्मकता का आरम्भ होता है।

     कामदेव की मकर ध्वज का मकार दोनों प्रकार का हो सकता है – बेकार ऊर्जा वाला भी और अन्तस्थ प्रकार वाला भी।

     गर्ग संहिता में मकर गिरि पर मधु मक्षिकाओं का वास कहा गया है जो काट लेती हैं। उपरोक्त कथन के अनुसार ही इसकी व्याख्या की जा सकती है।

          मकर संक्रान्ति पर खिचडी  द्रव्य का प्रयोग सार्वत्रिक रूप से किया जाता है। यह अन्वेषणीय है कि मकर संक्रान्ति का खेचरी मुद्रा या खेचरी स्थिति से क्या सम्बन्ध है।

     मकार के लिए ओंकार शब्द पर टिप्पणी पठनीय है।

प्रथम लेखन – 30-5-2015ई.(ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी, विक्रम संवत् 2072)

 

मकार

 

 

मकर अग्नि ३४१.१८(नृत्य में असंयुत कर की १३ मुद्राओं में से एक),

गरुड १.५३.५(मकर निधि के स्वरूप का कथन),

मकरेणाङ्कितः खड्गबाणकुन्तादिसंग्रही॥१,५३.५॥

दद्याच्छ्रुताय मैत्रीं च याति नित्यं च राजभिः।

द्रव्यार्थं शत्रुणा नाशं संग्रामे चापि संव्रजेत्॥१,५३.६॥

मकरः कच्छपश्चैव तामसौ तु निधी स्मृतौ।

 

गर्ग ७.२९.१३(मकर गिरि पर मधु मक्षिकाओं का वास, मधु - मक्षिकाओं द्वारा प्रद्युम्न सेना पर आक्रमण व मोचन),

मकराख्यात्ततो देशात्प्रद्युम्नो मीनकेतनः।।13।।ययौ वृष्णिवरैः सार्द्धं दुन्दुभीन्वादयन्मुहुः।। मकरस्य गिरेः पार्श्वं दुंदुभिध्वनिभिस्ततः।।14।। मधुभक्ष्या मधुकराः कोटिशः प्रोत्थिताः किल।। तैर्दंशितं बलं सर्वं हस्तिचीत्कार संयुतम्।।15।। तदा कार्ष्णिर्महाबाहुः पवनास्त्रं समादधे।। तद्वातताडिता राजन्गतास्तेपि दिशो दश।। 16।। तत्र देशे जना राजन्सर्वे वै मकराननाः।। ८.३८?(काम की मकर ध्वज का उल्लेख),

नारद २.६३(मकर सङ्क्रान्ति),

भागवत ५.१६.२७(मेरु के उत्तर में स्थित २ पर्वतों में से एक),

प्रागायतावेवमुत्तरतस्त्रिशृङ्गमकरावष्टभिरेतैः परिसृतोऽग्निरिव परितश्चकास्ति काञ्चनगिरिः  ॥ 05.16.027 _*

 

भागवत १२.११.१२(विष्णु के मकराकृत कुण्डलों के सांख्य और योग के प्रतीक होने का उल्लेख),

बिभर्ति साङ्ख्यं योगं च देवो मकरकुण्डले  ।

मौलिं पदं पारमेष्ठ्यं सर्वलोकाभयङ्करम्  ॥ 12.11.012

डा. फतहसिंह का कहना है कि दो स्थितियां हैं – एक सांख्य की, एक योग की। जब हम किसी घटना के, वस्तु के टुकडे – टुकडे करके देखते हैं तो वह सांख्य की स्थिति है। जब हम एकीकृत रूप देखते हैं तो वह योग है।

मत्स्य ५८.१८(तडाग आदि निर्माण में सौवर्ण मकर दान का निर्देश),

सौवर्णकूर्ममकरौ राजतौ मत्स्यदुन्दुभौ

ताम्रौ कुलीर मण्डूका वायसः शिशुमारकः

एवमासाद्य तत्सर्वमादावेव विशां पते  18

 

मत्स्य १४८.४५(तारक - सेनानी ग्रसन के ध्वज का मकर चिह्न होने का उल्लेख),

केतुना मकरेणापि सेनानीर्ग्रसनोऽरिहा 

मार्कण्डेय ६७.५/६५.५(पद्मिनी विद्या के अन्तर्गत ८ निधियों में से एक), मार्कण्डेय ६७.१६/६५.१६ (तामसी प्रकृति वाली मकर निधि के आश्रित पुरुष के लक्षणों का कथन),

तामसो मकरो नाम निधिस्तेनावलोकितः

पुरुषोऽथ तमःप्रायः सुशीलोऽपि हि जायते ।

बाणखड्गर्ष्टिधनुषां चर्म्मणाञ्च परिग्रहम्

रसनानाञ्च कुरुते याति मैत्रीञ्च राजभिः ।

ददाति शौर्यवृत्तीनां भूभुजां ये च तत्प्रियाः ।। १८ ।।

क्रयविक्रये च शस्त्राणां नान्यत्र प्रीतिमेति च ।

एकस्यैव भवत्येष न च तस्यानुयानुगः (नरस्यनसुतानुगः) ।। १९ ।।

द्रव्यार्थं दस्युतो नाशं संग्रामे वापि स व्रजेत् ।

 

वायु ४१.१०(कुबेर की ८ निधियों में से एक),

वायु१०५.४८/२.४३.४५(सूर्य व चन्द्र ग्रहण के मकर में होने पर गया में पिण्ड दान के महत्त्व का उल्लेख),

मकरे वर्त्तमाने च ग्रहणे चन्द्रसूर्य्ययोः।

दुर्ल्लभं त्रिषु लोकेषु गयाश्राद्धं सुदुर्ल्लभम्॥2.43.45

 

विष्णु २.८.२८(उत्तरायण के आरम्भ में सूर्य के मकर राशि में आने का उल्लेख),

अयनस्योत्तरस्यादौ मकरं याति भास्करः  ।

ततः कुम्भं च मीनं च राशे राश्यन्तरं द्विज  ॥ २,८.२८ ॥

विष्णुधर्मोत्तर ३.५२.१६(रति के हाथ में मकर सौख्य का प्रतीक होने का उल्लेख),

विष्णुधर्मोत्तर३.१०६.३६(मकर/झष आवाहन मन्त्र),

स्कन्द १.२.७.४८(अनायास घृतकम्बल दान से बालक का शिवगण बनना),

स्कन्द २.२.४२(मृग/मकर संक्रान्ति उत्सव अनुष्ठान की विधि),

६.२७१.६५(मकर संक्रान्ति को घृतकम्बल दान से बालक के  शिव गण बनने का वृत्तान्त),

इंद्रद्युम्न उवाच।। तपसः किं प्रभावोऽयं दानस्य नियमस्य च।। यदायुरीदृशं जातं बकत्वेऽपि वदस्व नः।।61।। बक उवाच।। घृतकंबलमाहात्म्याद्देवदेवस्य शूलिनः।। ममायुरीदृशं जातं बकत्वं मुनिशापतः।।62।। अहमासं पुरा बालो ब्राह्मणस्य निवेशने।। चमत्कारपुरे रम्ये पाराशर्यस्य धीमतः।।64।। नाम्ना च विश्वरूपाख्यो नाम्ना ऽन्येन बक स्मृतः।। अतीव चपलत्वेन संयुक्तः पितृवल्लभः।।64।। कस्यचित्त्वथ कालस्य संक्रांतौ मकरस्य भोः।। संप्राप्यातीव चापल्याल्लिंगं जागेश्वरं मया।। घृतकुम्भे परिक्षिप्तं पूजितं जनकेन यत्।।65।। अथ रात्र्यां व्यतीतायां पृष्टोऽहं जनकेन च।। त्वया पुत्र परिक्षिप्तं नूनं जागेश्वरं क्वचित्।। तस्माद्वद प्रयच्छामि तेन ते भक्ष्यमुत्तमम्।।66।। ततो मयाज्यकुम्भाच्च तस्मादादाय सत्वरम्।। भक्ष्यलौल्यात्पितुर्हस्ते विन्यस्तं घृतसंप्लुतम्।।67।। कस्यचित्त्वथ कालस्य पंचत्वं च समागतः।। जातिस्मरस्ततो जातस्तत्प्रभावान्नृपालये।।68।। आनर्ताधिपतेर्हर्म्ये नाम्ना ख्यातस्त्वहं बकः।। चमत्कारपुरे देवो हरः संस्थापितो मया।।69।। तत्प्रभावेण विप्रेंद्र प्राप्तः पैतामहं पदम्।।6.271.70।। ततो यानि धरापृष्ठे सुलिंगानि स्थितानि च।। घृतेच्छादयाम्येव मकरस्थे दिवाकरे।। मया यत्स्थापितं लिंगं चमत्कारपुरे शुभम्।।71।। आराधितं दिवा नक्तं राज्ये संस्थाप्य पुत्रकम्।। नियोज्य सर्वतो भृत्यान्धनवस्त्रसमन्वितान्।।72।। ततःकालेन महता तुष्टो मे भगवाञ्छिवः।। मत्समीपं समासाद्य वाक्यमेतदुवाच सः।।73।। परितुष्टोऽस्मि भद्रं ते तव पार्थिवसत्तम।। घृतकंबलदानेन संख्यया रहितेन च।। 74।। तस्माद्वरय भद्रं ते वरं यन्मनसि स्थितम्।। अदेयमपि दास्यामि यद्यपि स्यात्सुदुर्लभम्।।75।। ततो मया हरः प्रोक्तो यदि तुष्टोऽसि मे प्रभो।. कुरुष्व मां गणं देव नान्यत्किंचिद्वृणोम्यहम्।।76।। श्रीभगवानुवाच।। बकैहि त्वं महाभाग कैलासं पर्वतोत्तमम्।। मया सार्धमनेनैव शरीरेण गणो भव।।77।। अन्योऽपि मर्त्यलोकेत्र यः करिष्यति मानवः।। मकरस्थे रवौ मह्यं संक्रांतौ रजनीमुखे। स नूनं मद्गणो भावी सकृत्कृत्वाऽथ कंबलम्।।78।। त्वं पुनर्मामकं लिंगं समं कुर्वन्भविष्यसि।। धर्मसेनेति विख्यातो विकृत्या परिवर्जितः।।79।। एवमुक्त्वा स भगवान्मामादाय ततः परम्।। कैलासं पर्वतं गत्वा गणकोटीशतामदात्।।6.271.80।। कस्यचित्त्वथ कालस्य भ्रममाणो यदृच्छया।। गतोऽहं पर्वतश्रेष्ठं हिमवंतं महागिरिम्।।81.

लक्ष्मीनारायण १.४९८.११(मकर संक्रान्ति पर विप्रों द्वारा पांच रात्रि निवास हेतु पुष्कर को जाने पर दमयन्ती द्वारा विप्र - पत्नियों को दान देने की कथा),

लक्ष्मीनारायण २.१०९(जलपान देश के राजा मकरकेतु द्वारा अरुणों से युद्ध व मरण),

लक्ष्मीनारायण २.१२१.१००(राशि चक्र वर्णन के  अन्तर्गत मकर राशि का उल्लेख),

लक्ष्मीनारायण ३.१४.४५(इच्छानुसार रूप धारण करने वाले असंख्य माकर महादैत्यों का वर्णन),

लक्ष्मीनारायण ३.१३१.९(मकरस्थ वारुणी देवी के न्यास का उल्लेख), लक्ष्मीनारायण ३.१५१.८१(दान से रहित, स्वार्थपूर्ति हेतु प्रयुक्त धन की मकर संज्ञा),

लक्ष्मीनारायण ३.१७५.४(संसार सागर तरण में काम क्रोधादि रूपी मकर से विघ्न होने का उल्लेख),

कथासरित् २.४.७९(मकरदंष्ट्रा कुट्टनी द्वारा निर्धन विप्र को गृह से बाहर निकलवाने का वृत्तान्त),

कथासरित् १०.१.७९(सुन्दरी वेश्या की माता मकरकटी नामक कुट्टनी का वर्णन ) makara

 

मकरध्वज ब्रह्माण्ड ३.४.११.२८(शिव द्वारा मकरध्वज के दहन का उल्लेख), ३.४.१९.६७(भण्डासुर के वधार्थी ५ कामों में से एक), ३.४.३०.५६(ललिता देवी के पुत्र रूप में उत्पन्न काम की मकरध्वज संज्ञा), ३.४.४४.७४(मकरध्वजा : वर्णों की ४८ शक्तियों में से एक), मत्स्य १५४.२४४(मकरध्वज द्वारा शिव को मोहन अस्त्र से विद्ध करने का उल्लेख), लक्ष्मीनारायण २.१४०.५७(मकरध्वज प्रकार के प्रासाद की विशेषता का कथन : १२ तिलक, ७७ अण्ड, १० तल ) makaradhwaja

 

मकरन्द भविष्य ३.३.२१.२०(अग्नि/यज्ञ से उत्पन्न मयूरध्वज - पुत्र मकरन्द द्वारा धर्म से शिलामय अश्व की प्राप्ति का प्रसंग), ३.३.२१.६३(गोवर्धन का अंश), ३.३.२१.७९(वह्नि कुण्ड से उत्पन्न व शनि - प्रदत्त भल्ल से युक्त मकरन्द द्वारा शत्रुओं को परास्त करने व जयन्त से पराजित होने का वृत्तान्त), मत्स्य १३.४३(मकरन्द पीठ में देवी की चण्डिका नाम से स्थिति का उल्लेख), कथासरित् ८.५.७९(मकरन्द के ८ वसुओं के समान विक्रम, संक्रम आदि ८ पुत्रों के नाम), १०.३.११७(विद्याधरराज - कन्या मकरन्दिका की पार्थिव राजा सोमप्रभ पर आसक्ति, माता - पिता  के शाप से निषाद - पुत्री बनना व सोमप्रभ को पति रूप में प्राप्त करना), १८.२.५(खण्डकापालिक द्वारा मकरन्द नामक उद्यान में मदनमञ्जरी यक्षी के दर्शन व उसके वशीकरण का उद्योग ) makaranda

 

मकराक्ष वामन ५७.८९(गयाशिर द्वारा कार्तिकेय को प्रदत्त गण), ५८.७८(मकराक्ष द्वारा बाण से युद्ध का कथन), स्कन्द ३.१.४४.३७(खर – पुत्र, विभीषण द्वारा वध का उल्लेख), वा.रामायण ६.७८+ (खर - पुत्र, राम द्वारा वध ) makaraaksha

 

अकारो जाग्रति नेत्रे वर्तते सर्वजन्तुषु । उकारः कण्ठतः स्वप्ने मकारो हृदि सुप्तितः ॥ ७४॥  विराड्विश्वः स्थूलश्चाकारः । हिरण्यगर्भस्तैजसः सूक्ष्मश्च उकारः । कारणाव्याकृतप्राज्ञश्च मकारः । अकारो राजसो रक्तो ब्रह्म चेतन उच्यते । उकारः सात्त्विकः शुक्लो विष्णुरित्यभिधीयते ॥ ७५॥  मकारस्तामसः कृष्णो रुद्रश्चेति तथोच्यते । - योगचूडामण्युप.

 

तावद्रथेन गन्तव्यं यावद्रथपथि स्थितः । स्थित्वा रथपथस्थानं रथमुत्सृज्य गच्छति ॥ ३॥  मात्रालिङ्गपदं त्यक्त्वा शब्दव्यञ्जनवर्जितम् । अस्वरेण मकारेण पदं सूक्ष्मं च गच्छति ॥ ४॥ - अमृतनादोपनिषद

रोहिणीतनयो विश्व अकाराक्षरसंभवः १०॥ तैजसात्मकः प्रद्युम्न उकाराक्षरसंभवः प्राज्ञात्मकोऽनिरुद्धोऽसौ मकाराक्षरसंभवः ११॥ अर्धमात्रात्मकः कृष्णो यस्मिन्विश्वं प्रतिष्ठितम् । - गोपालोत्तरतापिन्युपनिषद

अकारादभवद्ब्रह्मा जाम्बवानितिसंज्ञकः ।

उकाराक्षरसंभूत उपेन्द्रो हरिनायकः ॥ १॥

 

मकाराक्षरसंभूतः शिवस्तु हनुमान्स्मृतः ।

बिन्दुरीश्वरसंज्ञस्तु शत्रुघ्नश्चक्रराट् स्वयम् ॥ २॥

 

नादो महाप्रभुर्ज्ञेयो भरतः शङ्खनामकः ।

कलायाः पुरुषः साक्षाल्लक्ष्मणो धरणीधरः ॥ ३॥

 

कलातीता भगवती स्वयं सीतेति संज्ञिता ।

तत्परः परमात्मा च श्रीरामः पुरुषोत्तमः ॥ ४॥ - तारसारोपनिषद

 

कारेणेममात्मानमन्विष्य मकारेण ब्रह्मणानु- सन्दध्यादुकारेणाविचिकित्सन्नशरीरोऽनिन्द्रियोऽप्राणोऽतमाः सच्चिदानन्दमात्रः स स्वराड् भवति य एवं वेद - - - -- तस्मादकारेण परमं ब्रह्मान्विष्य मकारेण मन आद्यवितारं मन आदिसाक्षिण- मन्विच्छेत् - नृसिंहोत्तरतापिन्युपनिषद

 

ते क्रमेण षोडशमात्रारूढाः अकारे जाग्रद्विश्व उकारे जाग्रत्तैजसो मकारे जाग्रत्प्राज्ञ अर्धमात्रायां जाग्रत्तुरीयो बिन्दौ स्वप्नविश्वोनादे स्वप्नतैजसः कलायां स्वप्नप्राज्ञः कलातीते स्वप्नतुरीयः शान्तौ सुषुप्तविश्वः शान्त्यतीते सुषुप्ततैजस उन्मन्यां सुषुप्तप्राज्ञो मनोन्मन्यां सुषुप्ततुरीयः तुर्यां तुरीयविश्वोमध्यमायां तुरीयतैजसः पश्यन्त्यां तुरीयप्राज्ञः परायां तुरीयतुरीयः जाग्रन्मात्राचतुष्टयमकारांशं स्वप्नमात्राचतुष्टयमुकारांशं सुषुप्तिमात्राचतुष्टयं मकारांशं तुरीयमात्राचतुष्टयमर्धमात्रांशम् । अयमेव ब्रह्मप्रणवः । - परमहंसपरिव्राजकोपनिषद

अकारेवह्निरित्याहुरुकारे हृदि संस्थितः ॥ ६९॥  मकारे च भ्रुवोर्मध्ये प्राणशक्त्या प्रबोधयेत् । ब्रह्मग्रन्थिरकारे च विष्णुग्रन्थिर्हृदि स्थितः ॥ ७०॥  रुद्रग्रन्थिर्भ्रुवोर्मध्ये भिद्यतेऽक्षरवायुना । अकारे संस्थितो ब्रह्मा उकारे विष्णुरास्थितः ॥ ७१॥  मकारे संस्थितो रुद्रस्ततोऽस्यान्तः परात्परः । - ब्रह्मबिन्दूपनिषद

ऊर्ध्वनालमधोबिन्दुस्तस्य मध्ये स्थितं मनः । अकारे रेचितं पद्ममुकारेणैव भिद्यते ॥ १३८॥  मकारे लभते नादमर्धमात्रा तु निश्चला । - योगतत्त्वोपनिषद

 

http://astrology.raftaar.in/Astro/Daily-Horoscope/Hindi-Prediction/makar-Rashi

 

मकर राशि का स्वामी ग्रह शनि होता है। भगवान शनि देव और हनुमान जी को मकर राशि का आराध्य देव माना जाता है।

 

 

Vedic Astrology

Capricorn is represented as Unicorn, an extinct animal, but one that has special significance in ancient myths. Capricorn is known as Makar in Sanskrit denoting the pentagon, which symbolizes microcosm. This sign is said to represent simultaneously the microcosm, the human body, and the macrocosm, the world of external objects of perception. It is under this sign of the zodiac that unity between the inner man and the outer Cosmic Man begins to be established.

 

Esoteric Meaning of Capricorn

Posted on July 24, 2013 elange610

 

The flashes of intuition with which he is becoming familiar change into the blazing and constant light of the soul, irradiating the mind and providing that point of fusion which must ever be the “fusion of the two lights, the greater and the lesser light.” The light of the personality and the light of the soul blend.

 

http://www.light-weaver.com/astrology/astr1060.html

it, therefore, relates man to the mineral kingdom; it is also the sign of the Crocodiles which live half in the water and half on dry land; it is spiritually the sign of the Unicorn which is the "fighting and triumphant creature" of the ancient myths. Under the symbolism of the above creatures, this sign gives us a rather complete picture of man with his feet upon the earth, yet running free and climbing to the heights of worldly ambition or of spiritual aspiration in search of what he realizes (at any particular time) to be his major need.- - -- -- -- -

Then Capricorn, the Goat, related particularly and closely to Aries, but hiding (as an esoteric blind) the symbolism of the Unicorn in which the two horns and the single eye are blended and depicted by the long straight horn of the unicorn in the center of the forehead

http://www.light-weaver.com/astrology/astr1065.html

Jupiter, which has been the ruler of Pisces and also of Aquarius, falls in this sign. This fall must be studied from two angles, for Jupiter in its lowest aspect gives the fulfilment of desire and satisfied demand, whilst in its highest Jupiter is the outgoing expression of love,